Sunday, 22 March 2015

गुरु गौरव गीता

गुरु गौरव गीता
❖ सरोवर हैं विद्यासागर ❖
आचार्य श्री विद्यासागर को, शत शत वंदन करता हूँ ।
गुरु के "उज्ज्वल संयम" की मैं, गौरव गीता गाता हूँ ॥
जैसे मानस सरवर है, वैसे ही तो गुरुवर हैं ।
सरवर में निर्मल जल है, गुरु में सम्यक् शम जल है॥
ज्यों सरवर में खुले - खिलें, बहु प्रकार के कमल मिले ।
त्यों गुरुवर में विपुल मिलें, गुण के सुन्दर कमल खिलें ॥
सरवर में जैसा तट है, त्यों गुरु में व्रत का तट है ।
जैसे सरवर शांत रहे, त्यों गुरु का मन शांत रहे ॥
सरवर में ज्यों हंसा है, गुरु में विवेक हंसा है ॥
सर में मिलता ज्यों मोती, गुरु से गुण के त्यों मोती ॥
ऐसे गुरु के श्री चरणों में, जो नित शीश झुकाता है ।
वही सातिशय पुण्य प्राप्त कर, सर्वोत्तम सुख पाता है ॥
- मुनि श्री १०८ उत्तमसागर जी द्वारा रचित

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